यात्रा मार्गदर्शन

श्री काल भैरव मंदिर, के 32/22, भैरोनाथ, विश्वेश्वरगंज, वाराणसी, उत्तर प्रदेश 221001, भारत

गंगा काशी विश्वनाथमृत्युंजय महादेवमैदागिन चौराहाचौकगोदौलियादशाश्वमेध घाटमणिकर्णिका घाटपंचगंगा घाटवाराणसी जंक्शनराजघाट पुलअस्सी, संकट मोचन काल भैरव मंदिर
आने का उत्तम समय
अक्टूबर से मार्च का मौसम सबसे सुखद रहता है। मंगलवार को छोड़कर सप्ताह के किसी सामान्य दिन सुबह जल्दी आने पर भीड़ सबसे कम मिलती है। रविवार, मंगलवार, कालाष्टमी और पर्वों पर बहुत अधिक भीड़ रहती है।
कितना समय रखें
सामान्य दिन की शांत सुबह में लगभग 30 से 60 मिनट; रविवार, मंगलवार और पर्वों पर दो घंटे या उससे अधिक समय रखें।
प्रवेश शुल्क
दर्शन निःशुल्क है। किसी आधिकारिक सशुल्क या वीआईपी दर्शन टिकट की जानकारी नहीं मिली। गर्भगृह तक सीधे दर्शन कराने के नाम पर श्रद्धालुओं से पैसे लेने वाले दलालों पर पुलिस कार्रवाई कर चुकी है।
वेशभूषा
कोई निर्धारित वेशभूषा नहीं है। कंधे और घुटने ढकने वाले शालीन वस्त्र उचित हैं और जूते-चप्पल मंदिर के बाहर उतारने होते हैं।
फोटोग्राफी
गर्भगृह में विग्रह की फोटो लेना उचित नहीं माना जाता, और एक यात्रा वेबसाइट के अनुसार कैमरा, फोन और बैग भीतर ले जाने की अनुमति नहीं है। मंदिर कर्मचारियों और ड्यूटी पर तैनात पुलिस के निर्देशों का पालन करें।

श्री काल भैरव मंदिर, के 32/22, भैरोनाथ, विश्वेश्वरगंज, वाराणसी, उत्तर प्रदेश 221001, भारत

दर्शन का क्रम

  1. मैदागिन या विश्वेश्वरगंज पर उतरें

    कोई कार या ऑटो मंदिर के द्वार तक नहीं पहुँच सकता। मैदागिन चौराहे पर या टाउन हॉल और कोतवाली थाने के पास विश्वेश्वरगंज में उतरें। काशी विश्वनाथ से चौक होकर पैदल बीस से पच्चीस मिनट लगते हैं, या मैदागिन तक ई-रिक्शा ले सकते हैं। रविवार, मंगलवार और पर्वों पर पुलिस रास्ते में बैरिकेडिंग करती है और कतार विश्वेश्वरगंज चौराहे से ही शुरू हो सकती है, इसलिए समय हाथ में रखकर चलें।

  2. भैरोनाथ की गलियों में पैदल चलें

    मुख्य सड़क से मंदिर कुछ ही मिनट की पैदल दूरी पर है; मानचित्र पर यह टाउन हॉल से लगभग 250 से 300 मीटर पूर्व में पड़ता है। गलियाँ सँकरी हैं और इनमें दोपहिया वाहन भी चलते हैं। फूल, तेल और काले धागे की दुकानों की कतार के साथ-साथ चलें, या किसी से भी काल भैरव या भैरोनाथ का रास्ता पूछ लें; यहाँ हर कोई जानता है। मानचित्र की सूचियों में एक से अधिक रास्ते दिखते हैं, जिनमें घासी टोला की ओर का एक रास्ता गेट नंबर 2 के नाम से दर्ज है। प्रवेश किस ओर से होगा और निकास किस ओर से, यह ड्यूटी पर तैनात पुलिस तय करती है और भीड़ के अनुसार बदलता रहता है।

  3. सादा अर्पण लें और जूते-चप्पल उतारें

    गली की दुकानों पर सजी हुई टोकरियाँ मिलती हैं। सामान्य अर्पण में सरसों या तिल का तेल, काले तिल, फूल या माला और थोड़ी मिठाई होती है, साथ में वह काला धागा जिसे भीतर अभिमंत्रित कराया जाता है। कुछ श्रद्धालु मदिरा भी चढ़ाते हैं; यह पूरी तरह ऐच्छिक है। टोकरी सजने से पहले ही दाम तय कर लें; सादा अर्पण पर्याप्त है। जूते-चप्पल प्रायः उसी दुकान पर छोड़े जाते हैं जहाँ से सामग्री ली हो, या द्वार के पास के स्टैंड पर (यह दर्शनार्थियों की बताई सामान्य रीति है; किसी आधिकारिक जूता-घर की पुष्टि नहीं हुई)। दुकान याद रखें, क्योंकि गलियाँ एक जैसी दिखती हैं।

  4. कतार में लगें और श्वान वाले द्वार से प्रवेश करें

    गली से लगे द्वार पर भैरव के वाहन श्वान की प्रतिमा पहरा देती है। भीतर मेहराबदार बरामदों से घिरा छोटा आँगन है, जिसके बीच में मंदिर है, और कतार घूमकर गर्भगृह के सामने खंभों वाले मंडप तक पहुँचती है। दर्शनार्थियों के अनुसार सामान्य दिन की सुबह लगभग आधा घंटा लगता है और भीड़ होने पर एक घंटा या उससे अधिक। फोन भीतर न निकालें: दिसंबर 2024 में मंदिर प्रबंधन ने गर्भगृह में फोटो, वीडियो और रील बनाने पर रोक लगा दी थी, और एक यात्रा वेबसाइट के अनुसार फोन, कैमरा और बैग भीतर ले जाने की अनुमति ही नहीं है। उस दिन मंदिर कर्मचारी और पुलिस जो कहें, वही मानें।

  5. रजत मुख के दर्शन

    मंडप से गर्भगृह के द्वार के भीतर दर्शन होते हैं। मालाओं से लदा बाबा का केवल रजत मुख दिखाई देता है; विग्रह का शरीर वस्त्र से ढका रहता है। मंदिर के महंत के अनुसार विग्रह सीधे भक्त की ओर नहीं देखता, बल्कि उसका मुख श्मशान की ओर है, जहाँ से कोतवाल पूरी नगरी की रखवाली करते हैं। अपनी टोकरी पुजारी को दें; वे आपकी ओर से अर्पण करते हैं। भीड़ में कुछ ही क्षण मिलते हैं, इसलिए हाथ जोड़ें, अपनी प्रार्थना कहें और आगे बढ़ें।

  6. दंड का आशीर्वाद लें

    मंडप के पास पुजारी मोरपंख का गुच्छा, यानी कोतवाल का दंड, लिए बैठे रहते हैं। सिर झुकाएँ या पीठ आगे करें; वे हल्की थाप देते हैं। इसे बाबा का आशीर्वाद माना जाता है, जिससे रोग, भय और नज़र दूर होने की मान्यता है, और माता-पिता छोटे बच्चों को इसके लिए आगे करते हैं। माथे पर भभूत भी लगाई जा सकती है। थोड़ी दक्षिणा देने की रीति है और वह आपकी इच्छा पर है; किसी को भी निश्चित रकम माँगने का अधिकार नहीं है। 2025 और 2026 में पुलिस ने मंदिर से ऐसे लोगों को पकड़ा जो थाप और धागे के नाम पर बड़ी रकम माँग रहे थे।

  7. काला धागा बँधवाएँ

    काला धागा, जिसे गंडा या भैरव रक्षा सूत्र कहते हैं, मंदिर में अभिमंत्रित कराकर कलाई या गले में बाँधा जाता है। इसे नज़र, रोग और भय से रक्षा के लिए पहना जाता है, और विशेष रूप से बच्चों को बाँधा जाता है। अधिकतर परिवार उन लोगों के लिए कुछ धागे घर भी ले जाते हैं जो साथ नहीं आ सके। धागे बाहर की दुकानों पर और आँगन के बरामदे की ऊँची गद्दियों पर बैठने वाले परिवारों के पास मिलते हैं।

  8. आँगन की परिक्रमा करें, फिर गलियों से लौटें

    भीड़ अनुमति दे तो आँगन की एक परिक्रमा करें। बरामदे के साथ छोटे-छोटे मंदिर हैं, जिनमें बटुक भैरव, राम के साथ हनुमान, दुर्गा और नवग्रह की बड़ी शिला है, जिस पर नौ ग्रहों की अलग-अलग वेदियाँ बनी हैं। बहुत से श्रद्धालु लौटने से पहले मंदिर के पास के कुत्तों को खिलाते हैं, क्योंकि श्वान भैरव का वाहन है। पुरानी मार्गदर्शिकाओं और आज की मानचित्र-सूचियों के अनुसार मंदिर से कुछ ही क़दम पूर्व में दंडपाणि का मंदिर है, जहाँ कोतवाल के पत्थर के दंड की पूजा होती है, और दारानगर का मृत्युंजय महादेव मंदिर उत्तर में लगभग दस मिनट की पैदल दूरी पर है। जूते-चप्पल लें और पैदल विश्वेश्वरगंज या मैदागिन की ओर लौट आएँ।

कैसे पहुँचें

रेल से
वाराणसी जंक्शन (कैंट, BSB) मंदिर से लगभग 4.5 किमी दूर है; ऑटो या ई-रिक्शा से मैदागिन या विश्वेश्वरगंज तक 20 से 30 मिनट लगते हैं। बनारस स्टेशन (BSBS, पूर्व नाम मंडुवाडीह) लगभग 6 से 8 किमी और काशी स्टेशन (KEI) लगभग 2.5 किमी दूर है।
हवाई मार्ग से
बाबतपुर स्थित लाल बहादुर शास्त्री अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा मंदिर से लगभग 25 किमी दूर है। ट्रैफ़िक के अनुसार टैक्सी से लगभग 50 मिनट से एक घंटा लगता है और टैक्सी मैदागिन या विश्वेश्वरगंज तक छोड़ती है।
सड़क से
वाराणसी सड़क मार्ग से अच्छी तरह जुड़ा है और बसें वाराणसी जंक्शन के पास कैंट बस अड्डे पर पहुँचती हैं। शहर के भीतर ऑटो या ई-रिक्शा से मैदागिन चौराहे या कोतवाली और टाउन हॉल के पास विश्वेश्वरगंज तक आएँ और वहाँ से पैदल भैरोनाथ की गलियों में जाएँ।
काशी के भीतर
काशी विश्वनाथ से मंदिर लगभग 1.5 किमी उत्तर में है। चौक और ठठेरी बाज़ार होकर पैदल 20 से 25 मिनट लगते हैं, या मैदागिन तक ई-रिक्शा लेकर आगे पैदल जा सकते हैं। दशाश्वमेध घाट से यह लगभग 2 किमी है।

दर्शनार्थियों के लिए सुझाव

  • मंदिर सँकरी गलियों में है, जहाँ कार नहीं जा सकती। मैदागिन या विश्वेश्वरगंज पर उतरकर आख़िरी कुछ सौ मीटर पैदल चलें।
  • छोटी कतार के लिए सप्ताह के सामान्य दिन सुबह जल्दी आएँ। रविवार और मंगलवार को कतार मंदिर से विश्वेश्वरगंज चौराहे तक पहुँच सकती है।
  • दर्शन निःशुल्क है। जल्दी या सीधे दर्शन कराने का वादा करने वाले किसी व्यक्ति को पैसे न दें। दिसंबर 2025 में पुलिस ने मंदिर से दस दलालों को पकड़ा था, जो 500 से 1,100 रुपये तक वसूल रहे थे।
  • जूते-चप्पल उसी दुकान पर रखें जहाँ से पूजन सामग्री लें, या द्वार के पास के स्टैंड पर, और जगह याद रखें। यहाँ की गलियाँ एक जैसी दिखती हैं।
  • दुकानदार के टोकरी सजाने से पहले ही तेल, फूल और धागे का दाम तय कर लें। सादा अर्पण ही पर्याप्त है।
  • मदिरा चढ़ाना ऐच्छिक है। तेल, काले तिल और फूल ही यहाँ का सामान्य अर्पण हैं।
  • भीड़ में फोन और बटुआ सँभालकर रखें और कम सामान लेकर चलें। इन गलियों में ई-रिक्शा और दोपहिया वाहन भी निकलते रहते हैं।
  • दारानगर का मृत्युंजय महादेव मंदिर दस मिनट की पैदल दूरी पर है और प्रायः इसी फेरे में उसके दर्शन भी किए जाते हैं।

आसपास के दर्शनीय स्थल

  • मृत्युंजय महादेव मंदिर0.5 किमी

    दारानगर का शिव मंदिर, जहाँ श्रद्धालु आरोग्य और दीर्घायु की कामना करते हैं। अष्ट भैरवों में से असितांग भैरव इसके पास ही हैं।

  • मणिकर्णिका घाट1.2 किमी

    गंगा तट पर काशी का महाश्मशान, जिसे मोक्ष का द्वार माना जाता है।

  • श्री काशी विश्वनाथ मंदिर1.5 किमी

    बारह ज्योतिर्लिंगों में से एक और काशी का प्रधान मंदिर। काल भैरव इन्हीं के कोतवाल माने जाते हैं।

  • अन्नपूर्णा मंदिर1.5 किमी

    अन्न की देवी माता अन्नपूर्णा का मंदिर, काशी विश्वनाथ के समीप।

  • विशालाक्षी मंदिर1.5 किमी

    मीर घाट के पास स्थित शक्तिपीठ, काशी विश्वनाथ से थोड़ी ही पैदल दूरी पर।

  • दशाश्वमेध घाट2 किमी

    वाराणसी का प्रमुख घाट, जो हर शाम होने वाली गंगा आरती के लिए प्रसिद्ध है।

  • नमो घाट3 किमी

    नगर के उत्तरी छोर पर राजघाट के पास बना नया विकसित घाट।

  • संकट मोचन हनुमान मंदिर5 किमी

    नगर के दक्षिणी भाग का हनुमान मंदिर, जिसे परंपरा गोस्वामी तुलसीदास से जोड़ती है। मंगलवार और शनिवार का विशेष महत्व है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

वाराणसी के काल भैरव मंदिर में दर्शन का समय क्या है?

वाराणसी प्रशासन के पोर्टल के अनुसार मंदिर प्रतिदिन सुबह 5:00 बजे से रात 9:30 बजे तक खुला रहता है। कई यात्रा वेबसाइटों के अनुसार दोपहर में लगभग 1:30 बजे से 3:00 से 4:30 बजे के बीच तक गर्भगृह बंद रहता है। समय कम हो तो स्थानीय स्तर पर पुष्टि कर लें।

आरती कब होती है?

यात्रा वेबसाइटों के अनुसार मंगला आरती लगभग सुबह 4:00 बजे, भोग आरती दोपहर लगभग 1:00 बजे, संध्या आरती रात 8:00 से 8:30 बजे और शयन आरती देर रात होती है। ये समय किसी आधिकारिक सूचना से नहीं, यात्रा वेबसाइटों से लिए गए हैं, इसलिए कृपया उसी दिन मंदिर में पूछ लें।

काल भैरव को काशी का कोतवाल क्यों कहा जाता है?

परंपरा के अनुसार शिव ने भैरव को काशी में व्यवस्था बनाए रखने और अधर्म करने वालों को दंड देने के लिए नियुक्त किया, ठीक वैसे ही जैसे पुराने समय में कोतवाल नगर की रखवाली करता था। मान्यता है कि उनकी अनुमति के बिना कोई इस नगरी में नहीं रह सकता, इसीलिए तीर्थयात्री और नए तैनात अधिकारी, दोनों उनके दर्शन को आते हैं।

काल भैरव के दर्शन काशी विश्वनाथ से पहले करें या बाद में?

परंपरा दोनों तरह से कही जाती है। बहुत से लोग कहते हैं कि पहले कोतवाल की अनुमति लेनी चाहिए, जबकि कई श्रद्धालु विश्वनाथ के दर्शन के बाद यात्रा पूर्ण करने के लिए यहाँ आते हैं। सभी इस पर सहमत हैं कि उनके दर्शन के बिना काशी यात्रा अधूरी मानी जाती है।

मंदिर में मिलने वाला काला धागा क्या है?

यह गंडा या भैरव रक्षा सूत्र है, जो मंदिर में अभिमंत्रित कराकर कलाई या गले में पहना जाता है। श्रद्धालुओं की मान्यता है कि यह नज़र, रोग और बाधाओं से रक्षा करता है, और इसे प्रायः बच्चों को बाँधा जाता है।

पुजारी श्रद्धालुओं को मोरपंख से थाप क्यों देते हैं?

मोरपंख का गुच्छा कोतवाल काल भैरव के दंड का प्रतीक है। इसकी हल्की थाप उनका आशीर्वाद मानी जाती है और मान्यता है कि इससे रोग, भय और नज़र दूर होती है।

क्या यहाँ मदिरा चढ़ाई जाती है, और क्या यह अनिवार्य है?

जो श्रद्धालु इस परंपरा को मानते हैं वे बाबा को मदिरा चढ़ाते हैं, और वार्षिक श्रृंगार के भोग में भी यह शामिल रहती है। यह अनिवार्य नहीं है। सामान्य अर्पण सरसों या तिल का तेल, काले तिल, फूल और मिठाई है।

क्या प्रवेश शुल्क या वीआईपी दर्शन की व्यवस्था है?

दर्शन निःशुल्क है और किसी आधिकारिक सशुल्क दर्शन टिकट की जानकारी नहीं मिली। पैसे लेकर जल्दी दर्शन कराने की बात करने वाला व्यक्ति दलाल है; दिसंबर 2025 में पुलिस ने मंदिर से ऐसे दस लोगों को पकड़ा था।

मंदिर काशी विश्वनाथ, रेलवे स्टेशनों और हवाई अड्डे से कितनी दूर है?

यह काशी विश्वनाथ से लगभग 1.5 किमी, वाराणसी जंक्शन से लगभग 4.5 किमी, बनारस स्टेशन से लगभग 6 से 8 किमी और बाबतपुर हवाई अड्डे से लगभग 25 किमी दूर है। मैदागिन या विश्वेश्वरगंज से आख़िरी हिस्सा पैदल तय करना होता है।

किन दिनों सबसे अधिक भीड़ रहती है?

रविवार और मंगलवार, हर महीने की कृष्ण अष्टमी, भैरव अष्टमी और महाशिवरात्रि। दिसंबर 2025 के आख़िरी रविवार को एक स्थानीय समाचार पत्र ने श्रद्धालुओं की संख्या लगभग तीन लाख बताई थी। सामान्य दिनों की सुबह कहीं अधिक शांत रहती है।

मंदिर का प्रबंधन कौन करता है?

मंदिर का संचालन परंपरागत महंत और पुजारी परिवार करते हैं, कोई सरकारी न्यास नहीं। काशी की धरोहर पर हुए एक अध्ययन के अनुसार लगभग बीस परिवारों को इसके प्रबंधन में अधिकार प्राप्त है। गलियों में भीड़ की व्यवस्था कोतवाली पुलिस सँभालती है।

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