मंदिर का परिचय
वाराणसी के पुराने नगर में विश्वेश्वरगंज के पास भैरोनाथ की गलियों में काल भैरव का मंदिर है, जिन्हें काशी का कोतवाल, यानी नगर का रक्षक और दंडाधिकारी माना जाता है। मान्यता है कि उनकी अनुमति के बिना कोई काशी में वास नहीं कर सकता और काशी विश्वनाथ की यात्रा उनके दर्शन के बाद ही पूर्ण होती है। छोटे से गर्भगृह के द्वार से भगवान का केवल फूलों से सजा रजत मुख ही दिखाई देता है।
इतिहास
काल भैरव काशी के उन प्राचीन तीर्थों में हैं जिनका उल्लेख स्कंद पुराण के काशी खंड में मिलता है, और नगर के रक्षक के रूप में भैरव की उपासना आज खड़े किसी भी भवन से कहीं पुरानी है। वर्तमान मंदिर कब बना, इस पर स्रोत एकमत नहीं हैं। काशी की धरोहर पर हुए एक अध्ययन में, डायना एक और राणा पी. बी. सिंह जैसे विद्वानों के हवाले से, भीतरी आँगन की पिछली दीवार पर लगे एक शिलालेख का उल्लेख है, जिसके अनुसार वर्तमान भवन मराठा शासक बाजीराव पेशवा द्वितीय ने 1817 में बनवाया। कुछ अन्य स्रोत केवल इतना कहते हैं कि यह 17वीं सदी के मध्य में बना, और एक स्रोत मराठा सरदार विंचूरकर को इसका निर्माता बताता है। 1715 में बाजीराव पेशवा द्वारा निर्माण की बात भी बहुत दोहराई जाती है, पर बाजीराव प्रथम 1720 में पेशवा बने थे, इसलिए यह तिथि मेल नहीं खाती। जिस बात पर स्रोत सहमत हैं वह यह है कि पुरानी काशी के अनेक मंदिरों की तरह इस मंदिर का वर्तमान स्वरूप भी मराठा संरक्षण की देन है। मंदिर की दीवारों पर 1968 में संगमरमर लगाया गया और 1995 में उन परिवारों के लिए ऊँची गद्दियाँ बनाई गईं जिन्हें मंदिर की सेवा का अधिकार प्राप्त है।
काल भैरव की कथा
काशी में कही जाने वाली कथा इस विवाद से शुरू होती है कि सबसे श्रेष्ठ कौन है। जब ब्रह्मा जी ने अहंकार में शिव के प्रति अपमानजनक वचन कहे, तब शिव के क्रोध से भैरव प्रकट हुए और उन्होंने ब्रह्मा का पाँचवाँ सिर काट दिया। इससे उन पर ब्रह्महत्या का दोष लगा और वह कपाल उनके हाथ से चिपक गया। मुक्ति की खोज में वे तीनों लोकों में भटकते रहे। काशी पहुँचते ही कपाल उनके हाथ से छूटकर गिर गया। वह स्थान तभी से कपाल मोचन तीर्थ कहलाता है, जिसे परंपरा नगर के उत्तर में लाट भैरव के पास मानती है। दोष से मुक्त होकर भैरव काशी में ही रह गए और शिव ने उन्हें काशी का कोतवाल नियुक्त किया, यानी वह अधिकारी जो नगर में व्यवस्था रखता है और अधर्म करने वालों को दंड देता है। भक्तों की मान्यता है कि इसी कारण काशी में मरने वालों पर यमराज का अधिकार नहीं चलता और उनका हिसाब भैरव ही करते हैं। ये कथाएँ आस्था और शास्त्र-परंपरा का हिस्सा हैं और यहाँ उसी रूप में कही गई हैं जैसे परंपरा इन्हें सुनाती है।

काशी के कोतवाल
काशी में विश्वनाथ राजा हैं और काल भैरव उनके कोतवाल। मान्यता है कि उनकी अनुमति के बिना कोई इस नगरी में न प्रवेश कर सकता है, न रह सकता है और न यहाँ से जा सकता है, और नगर में होने वाले हर काम का हिसाब उनके पास रहता है। इसलिए श्रद्धालु उनके दर्शन को काशी यात्रा का ही अंग मानते हैं, और मंदिर के पुजारियों के अनुसार इसके बिना विश्वनाथ की यात्रा अधूरी रहती है। यह परंपरा सार्वजनिक जीवन तक पहुँचती है। समाचारों के अनुसार वाराणसी में तैनात होने वाले अधिकारी कार्यभार सँभालने से पहले यहाँ दर्शन करने आते हैं, और मई 2024 में प्रधानमंत्री ने वाराणसी से नामांकन भरने से पहले यहाँ पूजा की थी। नगर का कोतवाली थाना पास ही विश्वेश्वरगंज में है, और यह बात प्रसिद्ध है कि वहाँ एक कुर्सी बाबा काल भैरव के लिए रखी जाती है, क्योंकि असली थानेदार उन्हीं को माना जाता है।
मंदिर और विग्रह
मंदिर तक पैदल ही पहुँचा जाता है, उन सँकरी गलियों से होकर जिनमें फूल, तेल और काले धागे की दुकानें सजी रहती हैं। प्रवेश द्वार पर भैरव के वाहन श्वान की प्रतिमा पहरा देती है। द्वार के भीतर मेहराबदार बरामदों से घिरा लगभग 17 गुणा 13 मीटर का आँगन है, जिसके बीच में छोटा-सा मुख्य मंदिर है। विग्रह के बारे में कहा जाता है कि काल भैरव श्वान पर विराजमान हैं, हाथ में त्रिशूल है और गले में मुंडमाला। पर सामान्यतः विग्रह का शरीर वस्त्र से ढका रहता है और गर्भगृह के द्वार से केवल फूलों से सजा रजत मुख ही दिखाई देता है। आँगन के चारों ओर देवी, हनुमान, राधा-कृष्ण, पार्वती और गणेश के छोटे मंदिर हैं, और नवग्रह की एक बड़ी शिला है जिस पर हर ग्रह की अलग वेदी बनी है। मंदिर के पिछले द्वार पर क्षेत्रपाल भैरव की प्रतिमा बताई जाती है।

परंपराएँ: दंड, काला धागा और अर्पण
यहाँ के दर्शन की तीन परंपराएँ विशेष हैं। पहली है दंड। भैरव अपने पद के प्रतीक के रूप में मोरपंख का दंड धारण करते हैं, और मंदिर में पुजारी मोरपंख के गुच्छे से श्रद्धालुओं की पीठ या सिर पर हल्की थाप देते हैं। इसे कोतवाल का आशीर्वाद माना जाता है, जिससे रोग, नज़र और बाधाएँ दूर होने की मान्यता है। दूसरी है काला धागा, जिसे गंडा या भैरव रक्षा सूत्र कहते हैं। इसे मंदिर में अभिमंत्रित कराकर कलाई या गले में पहना जाता है और रक्षा के लिए बच्चों को भी बाँधा जाता है। तीसरी है अर्पण। सरसों या तिल का तेल, काले तिल, फूल, उड़द के बड़े और नीले फूलों की माला यहाँ के सामान्य चढ़ावे हैं, और बहुत से श्रद्धालु सरसों के तेल का दीपक जलाते हैं। जो श्रद्धालु इस परंपरा को मानते हैं वे बाबा को मदिरा भी चढ़ाते हैं, और वार्षिक श्रृंगार के भोग में भी यह शामिल रहती है; यह पूरी तरह ऐच्छिक है। कई भक्त मंदिर के आसपास के कुत्तों को भी खिलाते हैं, क्योंकि श्वान भैरव का अपना वाहन है।
धार्मिक महत्व
काल भैरव की उपासना सबसे बढ़कर रक्षा के लिए होती है। लोग भय, रोग, नज़र, मुकदमों और ग्रह-बाधा मानी जाने वाली परेशानियों से मुक्ति की कामना लेकर आते हैं। काशी की परंपराओं के एक अध्येता के अनुसार उनकी पूजा मोक्ष के लिए नहीं, बल्कि रक्षा, स्वास्थ्य और कुशल-मंगल के लिए की जाती है। रविवार और मंगलवार उनके विशेष दिन माने जाते हैं, और हर महीने की कृष्ण अष्टमी भी, जिसे कालाष्टमी कहते हैं। काशी की रक्षा अष्ट भैरव भी करते हैं, यानी भैरव के आठ रूप जो नगर के अलग-अलग हिस्सों में विराजमान हैं, और काल भैरव उन सबके प्रधान माने जाते हैं। यह वाराणसी के सबसे अधिक भीड़ वाले मंदिरों में है। दिसंबर 2025 में एक स्थानीय समाचार पत्र ने बताया कि सामान्य दिनों में साठ से सत्तर हज़ार श्रद्धालु यहाँ आते हैं और रविवार को इससे कई गुना अधिक, जब कतारें मंदिर की गलियों से विश्वेश्वरगंज और मैदागिन चौराहे तक पहुँच जाती हैं।

आँगन और उसके छोटे मंदिर
मंदिर छोटा है और चारों ओर से मकानों से घिरा है। स्थापत्य-इतिहासकार नील्स गुत्शो के अध्ययन के अनुसार, जिसे कल्चरल हेरिटेज ऑफ़ वाराणसी वेबसाइट पर उद्धृत किया गया है, मेहराबदार बरामदों वाला आँगन 17.4 गुणा 13.4 मीटर का है, जिसके बीच में मुख्य मंदिर है और उसका मुख लगभग ठीक उत्तर की ओर है। दर्शनार्थी गली से उस द्वार से भीतर आता है जिस पर भैरव का वाहन श्वान पहरा देता है, और गर्भगृह के सामने खंभों वाले मंडप पर खड़े होकर दर्शन करता है। उसी अध्ययन के अनुसार बरामदे का उत्तर-पूर्वी कोना पड़ोस के मकान में चला गया है और दो अन्य कोने भंडार बन गए हैं, इसलिए आँगन अपने नक्शे से अधिक सँकरा लगता है।
गुत्शो के नक्शे में परिसर के चौदह पूजा-स्थल गिने गए हैं। स्वयं काल भैरव के अतिरिक्त इसमें बटुक भैरव के दो विग्रह, श्मशान भैरव के साथ काल माधव, रामेश्वर नाम से दर्ज एक शिवलिंग, राम के साथ हनुमान, उन्मत्त भैरव, भैरवेश्वर, ब्रह्मा, नवग्रह, शमनेश्वर, राम-लक्ष्मण और हनुमान का समूह, दुर्गा और कालकूप नाम का एक कुआँ अंकित हैं। गर्भगृह के द्वार के दोनों ओर बटुक भैरव, श्मशान भैरव और काल माधव हैं; काल माधव विष्णु का वह रूप है जिसके दर्शन काशी की षोडश विष्णु यात्रा में किए जाते हैं। विदुषी डायना एक ने आँगन की परिक्रमा का वर्णन करते हुए देवी, हनुमान, राधा-कृष्ण, पार्वती और गणेश के मंदिरों का उल्लेख किया है और नवग्रह की उस बड़ी शिला को विशेष बताया है जिस पर हर ग्रह की अलग वेदी है।
1868 में इस मंदिर का वर्णन करने वाले पादरी मैथ्यू शेरिंग ने भी लगभग यही व्यवस्था देखी थी: उत्तर की ओर प्रवेश, चार घंटों वाला मंडप, देहरी के दोनों ओर आलों में द्वारपालेश्वर नाम के दो विग्रह, दीवार से टिका लाल रँगी नोकों वाला त्रिशूल, और भीतर ताँबे का छोटा-सा मंदिर, जिसमें रजत मुख और चार भुजाओं वाला पत्थर का विग्रह था और पास में तेल का दीपक जलता रहता था। उन्होंने बाहरी द्वार के बगल की दीवार पर भैरव और उनके श्वान के चित्र भी देखे। उन्हें बताया गया कि यह भवन चालीस से अधिक वर्ष पहले पूना के बाजीराव ने एक छोटे पुराने मंदिर की जगह बनवाया था, जो 1817 के शिलालेख की तिथि से मेल खाता है। आँगन के ठीक बाहर दक्षिण में उन्होंने घिसी हुई पुरानी मूर्तियों का एक मंदिर दर्ज किया, जिनमें से एक को उन्होंने पुनर्निर्माण के समय हटाया गया भैरव का पुराना विग्रह माना, और पश्चिम में शीतला का एक छोटा मंदिर। ये दोनों बाहरी मंदिर आज उसी रूप में हैं या नहीं, इसकी पुष्टि नहीं हो सकी।
बाद के बदलाव भी दर्ज हैं। 1968 में मंदिर की दीवारों पर संगमरमर की पट्टियाँ लगाई गईं। 1995 में बरामदे के खंभों के बीच उन बीस परिवारों के लिए ऊँची गद्दियाँ बनाई गईं जिन्हें मंदिर के प्रबंधन में अधिकार प्राप्त है; इन्हीं गद्दियों से वे काले कपड़े की पट्टियाँ और पूजा की अन्य सामग्री बेचते हैं। फर्श और चबूतरों में जड़ी संगमरमर की अनेक छोटी पट्टियाँ दिवंगत जनों की स्मृति में दी गई हैं। गर्भगृह के भीतर इस अध्ययन में लगभग 90 गुणा 60 सेंटीमीटर की एक खंडित शिला का उल्लेख है, जिसकी बीच की आकृति छेनी से हटा दी गई है और सिंदूर की मोटी परत के नीचे दो परिचारक आकृतियाँ धुँधली-सी दिखती हैं।
कोतवाली थाने की कुर्सी
वाराणसी का कोतवाली थाना मैदागिन के पास विश्वेश्वरगंज में है, मंदिर से सीधी रेखा में लगभग तीन सौ मीटर दूर। मंदिर इसी थाने के क्षेत्र में पड़ता है, और इस थाने की अपनी एक परंपरा है। 2019 की समाचार रिपोर्टों के अनुसार थाना प्रभारी की मुख्य कुर्सी पर बाबा काल भैरव की तस्वीर रखी रहती है, और वहाँ तैनात इंस्पेक्टर बगल में रखी दूसरी कुर्सी पर बैठकर काम करते हैं।
अप्रैल 2019 में थाने से रिपोर्ट करने वाले ईटीवी भारत ने तत्कालीन थाना प्रभारी के हवाले से बताया कि तस्वीर लंबे समय से उस कुर्सी पर है और जो भी प्रभारी आता है वह उसके बगल में ही बैठता है। मंदिर के महंत ने चैनल को बताया कि यह परंपरा बहुत पहले एक थानेदार ने शुरू की थी। रिपोर्ट के अनुसार थाने की बाहरी दीवारों पर बाबा का नाम लिखा है, और जनसुनवाई के लिए बने कक्ष के शिलापट्ट पर एसएसपी से पहले बाबा काल भैरव का नाम लिखवाया गया। पत्रिका ने जुलाई 2019 में लिखा कि थाना प्रभारी तस्वीर को प्रणाम करके ही बैठते हैं और उस पर प्रतिदिन फूल-माला चढ़ाई जाती है।
इस परंपरा के साथ कई मान्यताएँ जुड़ गई हैं। थाना प्रभारी ने पत्रकारों से कहा कि तस्वीर रखे जाने के बाद क्षेत्र में अपराध पर नियंत्रण हुआ, और जब किसी अधिकारी ने तस्वीर हटाने की कोशिश की तो कोई गंभीर घटना घट गई। पत्रिका ने यह कहावत भी दर्ज की कि बड़े अधिकारी इस थाने का निरीक्षण नहीं करते, क्योंकि इसके मालिक स्वयं कोतवाल हैं, और उस अधिकारी का क़िस्सा भी जिसने निरीक्षण किया और शाम तक उसका तबादला हो गया। ये स्थानीय स्तर पर मानी और दोहराई जाने वाली मान्यताएँ हैं और यहाँ उसी रूप में दी गई हैं।
कुर्सी एक बड़ी परंपरा का हिस्सा है। इन्हीं रिपोर्टों और 2024 में फिर उद्धृत महंत के अनुसार वाराणसी में तैनात होने वाले अधिकारी, जिलाधिकारी और पुलिस कमिश्नर से लेकर नीचे तक, कार्यभार सँभालने से पहले काल भैरव के दर्शन करने आते हैं। राजनेता भी यही परंपरा निभाते हैं। प्रधानमंत्री ने 13 दिसंबर 2021 को काशी विश्वनाथ कॉरिडोर के लोकार्पण से पहले और फिर मई 2024 में वाराणसी से नामांकन भरने से पहले यहाँ पूजा की थी।

काशी खंड में काल भैरव
काल भैरव की कथा स्कंद पुराण के उस भाग में कही गई है जो काशी को समर्पित है, यानी काशी खंड में। जी. वी. तगारे के अंग्रेज़ी अनुवाद में यह अध्याय 31 है, जिसका शीर्षक भैरव का प्राकट्य है; अध्याय स्वयं को भैरवोत्पत्ति कहता है। ऋषि अगस्त्य स्कंद से पूछते हैं कि काशी में स्थापित ये भैरव कौन हैं, उनका रूप और कार्य क्या है और उनकी पूजा कब करनी चाहिए; पूरा अध्याय स्कंद का उत्तर है।
मेरु पर्वत पर ऋषि ब्रह्मा से पूछते हैं कि वह एक अविनाशी तत्व कौन है, और मोहवश ब्रह्मा स्वयं को ही बता देते हैं। नारायण के अंश क्रतु भी यही दावा करते हैं। निर्णय के लिए पूछे जाने पर चारों वेद शिव को ही सर्वोच्च बताते हैं। जब ब्रह्मा फिर भी अहंकार से बोलते हैं, तो शिव क्रोध में एक भयानक रूप वाला पुरुष उत्पन्न करते हैं और उसे नाम देते हैं: कालभैरव, क्योंकि काल भी उससे डरेगा; कालराज; आमर्दक, क्योंकि वह दुष्टों का मर्दन करता है; और पापभक्षण, जो भक्तों के पापों को खा जाता है। शिव उन्हें काशी का सदा का आधिपत्य देते हैं और कहते हैं कि यहाँ पाप करने वालों को दंड केवल वही देंगे और चित्रगुप्त उनका लेखा नहीं रखेंगे। तब भैरव अपने बाएँ हाथ की उँगली के नाखून से ब्रह्मा का पाँचवाँ सिर काट देते हैं।
प्रायश्चित के रूप में कपाल लेकर भिक्षा माँगने का आदेश पाकर भैरव तीनों लोकों में घूमते हैं। उनके पीछे-पीछे ब्रह्महत्या चलती है, जो भयानक स्त्री के रूप में उस हत्या का पाप है और वाराणसी को छोड़कर हर जगह जा सकती है। वे विष्णु के यहाँ जाते हैं, जो उनका सम्मान करते हैं, और अंत में काशी में प्रवेश करते हैं। उसी क्षण ब्रह्महत्या चीत्कार करके पाताल में समा जाती है, कपाल उनके हाथ से गिर जाता है, और वह स्थान कपालमोचन तीर्थ बन जाता है। ग्रंथ कहता है कि भैरव वहीं रह गए और अपने भक्तों के पापों का भक्षण करने लगे।
अध्याय के अंत में पूजा के जो नियम दिए गए हैं, वही आज भी मंदिर का पंचांग हैं। मार्गशीर्ष कृष्ण अष्टमी को व्रत रखकर कालभैरव के सामने जागरण करना चाहिए, और उस दिन की पूजा से वर्ष भर के विघ्न दूर होना बताया गया है। अष्टमी और चतुर्दशी तिथि तथा रविवार और मंगलवार की पूजा की प्रशंसा की गई है, प्रतिदिन आठ परिक्रमा करने को कहा गया है, और उनके दर्शन से पहले कालोदक नाम के जल में स्नान का विधान है। ग्रंथ चेतावनी देता है कि जो विश्वेश्वर के भक्त हैं पर कालभैरव के नहीं, उन्हें काशी में पग-पग पर विघ्न मिलते हैं। आगे अध्याय 72 में उन आठ भैरवों के नाम हैं जो नगर की दिशाओं की रक्षा करते हैं।
दंड, दंडपाणि और काला धागा
इस मंदिर से हर दर्शनार्थी दो चीज़ें लेकर लौटता है: मोरपंख के गुच्छे की थाप और काला धागा। दोनों परंपराएँ पुरानी हैं। 1868 में मैथ्यू शेरिंग ने मंडप के दोनों ओर एक-एक पुजारी को मोरपंख की छड़ी लिए बैठे देखा, जिससे वे बच्चों, स्त्रियों और अन्य लोगों पर झाड़ा देते थे ताकि बुरी आत्माएँ दूर रहें; पास में सिक्कों के लिए नारियल के खोल का कटोरा रखा रहता था। ई. बी. हैवेल ने 1905 में और रजनी रंजन सेन ने 1912 में इसी हल्की थाप का वर्णन किया है, और सेन लिखते हैं कि बड़े-बूढ़े छोटे बच्चों को इसके लिए कितनी उत्सुकता से आगे करते थे।
तब भी और अब भी इसकी व्याख्या यही दी जाती है कि भैरव कोतवाल हैं और मोरपंख उनके पद के दंड का प्रतीक है। डायना एक लिखती हैं कि भैरव की प्रतिमाओं में जो मोरपंख का दंड दिखता है, उसे उनकी ओर से एक पुजारी चलाता है, और उससे थाप खाना या झाड़ा जाना ऐसा आशीर्वाद माना जाता है जो शरीर के रोग और पीड़ा को दूर रखता है। पुराने लेखक एक दूसरी बात भी जोड़ते हैं, कि यह थाप अपने दोषों का सांकेतिक दंड है, जो साथ ही भक्त को उन दोषों से मुक्त भी कर देता है।
दंड का अपना एक मंदिर भी है। मंदिर से थोड़ा पूर्व में दंडपाणि हैं, जहाँ लगभग चार फुट ऊँचा खड़ा पत्थर भैरव के दंड के रूप में पूजा जाता है। 1868 से 1912 तक के विवरण बताते हैं कि विशेष दिनों पर उसे रजत मुखौटा पहनाया जाता है, रविवार और मंगलवार को वहाँ भीड़ रहती है, और वहाँ भी पुजारी मोरपंख से श्रद्धालुओं को थाप देते हैं। शेरिंग ने ध्यान दिलाया था कि दंडपाणि, यानी 'जिसके हाथ में दंड हो', मूल रूप से शिव के एक गण का नाम है, और समय के साथ उनका चिह्न स्वयं एक देवता के रूप में पूजा जाने लगा। यही मार्गदर्शिकाएँ दोनों मंदिरों के बीच नवग्रह का मंदिर और दंडपाणि के बगल में काल कूप बताती हैं, जिसमें दोपहर को ऊपर के एक छिद्र से सूर्य की किरण पड़ती है।
काले धागे को गंडा या भैरव रक्षा सूत्र कहते हैं। डायना एक इसे बटे और गुँथे हुए काले धागों की माला बताती हैं, जिसे भैरव से अभिमंत्रित कराकर रोग और भूत-प्रेत से रक्षा के ताबीज़ के रूप में गले या कलाई में बाँधा जाता है। वे यह भी लिखती हैं कि माथे पर भभूत लगाई जाती है और श्रद्धालु थोड़ी भभूत अगली बार आने तक लगाने के लिए घर ले जाते हैं। हिंदी विवरणों के अनुसार यह धागा विशेष रूप से बच्चों को दिया जाता है, ताकि वे भय-मुक्त रहें। मंदिर की सेवा करने वाले परिवार आँगन की अपनी गद्दियों से काले कपड़े की पट्टियाँ बेचते हैं, और बाहर की गलियाँ धागों की दुकानों से भरी हैं। कोई मूल्य-सूची प्रकाशित नहीं है। दिसंबर 2025 और मई 2026 की पुलिस कार्रवाई उन लोगों पर हुई जो श्रद्धालुओं को डराकर दंड की थाप, धागे या जल्दी दर्शन के नाम पर बड़ी रकम माँगते थे।

मंदिर में भैरव अष्टमी
भैरव अष्टमी मार्गशीर्ष (अगहन) कृष्ण अष्टमी को, नवंबर या दिसंबर में पड़ती है, और भैरव के प्राकट्य दिवस के रूप में मनाई जाती है। काशी खंड इस दिन व्रत रखकर कालभैरव के सामने रात भर जागरण करने को कहता है। 2024 में यह तिथि 23 नवंबर को और 2025 में 12 नवंबर को पड़ी।
मंदिर में यह दिन भोर से पहले शुरू हो जाता है। 2024 के उत्सव की रिपोर्टों के अनुसार भोर में बाबा का विशेष श्रृंगार हुआ और रात में फिर एक श्रृंगार, सवा लाख बत्तियों से विशेष आरती हुई, और सुबह से देर रात तक श्रद्धालु आते रहे। 2018 की एक रिपोर्ट में विग्रह के पंचामृत स्नान का उल्लेख है। 2024 में महंत ने इस दिन के लिए एक विशेष अर्पण बताया: सरसों का तेल अपने ऊपर से उतारकर बाबा को चढ़ाया जाए, जिससे विघ्न-बाधा और बुरी नज़र दूर होने की मान्यता है। 2024 में इसी दिन नगर के आठों भैरवों की प्रदक्षिणा यात्रा भी निकली।
कुछ वर्षों तक बाबा के जन्मोत्सव पर बहुत बड़ा केक काटा जाता रहा: 2018 में 601 किलो का और, एक रिपोर्ट के अनुसार, 2024 में 1,100 किलो का। यह परंपरा अब बंद कर दी गई है। 2024 के उत्सव के कुछ ही समय बाद गर्भगृह में एक दर्शनार्थी के केक काटने का वीडियो सोशल मीडिया पर फैल गया, और 1 दिसंबर 2024 को आज तक ने बताया कि महंत परिवार और मंदिर प्रबंधन ने निर्णय लिया है कि अब मंदिर में केक नहीं काटा जाएगा। उत्सवों पर उसके स्थान पर लड्डू और अन्य प्रसाद का भोग लगाकर बाँटा जाएगा, और इसी निर्णय में गर्भगृह में फोटो, वीडियो और रील बनाने पर भी रोक लगाई गई। 2025 में मंदिर में उत्सव कैसे मना, इसकी कोई रिपोर्ट नहीं मिली।
बाकी हर महीने की कृष्ण अष्टमी छोटे रूप में कालाष्टमी के नाम से मनाई जाती है। फरवरी 2025 की कालाष्टमी पर अमर उजाला की रिपोर्ट ऐसे दिन की तस्वीर देती है: पंचामृत स्नान, श्रृंगार और आरती, फल और मिठाई का भोग, और मंगला आरती से रात तक लगी कतार, जो विश्वेश्वरगंज चौराहे तक पहुँची। जो भैरव अष्टमी के दिन ही आएँ, उन्हें इससे कहीं लंबी प्रतीक्षा के लिए तैयार रहना चाहिए।
कपाल मोचन और लाट भैरव
काल भैरव की कथा कपाल मोचन पर पूरी होती है, यानी उस स्थान पर जहाँ ब्रह्मा का कपाल उनके हाथ से गिरा। परंपरा इसे नगर के उत्तर में, कज्जाकपुरा से पुराने पुल की ओर जाने वाले रास्ते पर स्थित एक बड़े पक्के कुंड से जोड़ती है। इसे भैरो का तालाब भी कहते हैं। इसकी पत्थर की सीढ़ियाँ और दीवारें अठारहवीं सदी में रानी भवानी की बनवाई मानी जाती हैं, और मान्यता है कि यहाँ स्नान से ब्रह्महत्या के दोष से मुक्ति मिलती है। अमर उजाला की एक पुरानी रिपोर्ट में कुंड गाद से भरा और उपेक्षित बताया गया था, जिसे एक स्थानीय समिति साफ़ कराने का प्रयास कर रही थी।
कुंड के ऊपर के चबूतरे पर लाट भैरव हैं, जिन्हें काशी के अष्ट भैरवों में कपाली भैरव गिना जाता है। लाट पत्थर के एक स्तंभ का बचा हुआ हिस्सा है, जिस पर ताँबे का आवरण चढ़ा है और जो लाल रँगा है। 1900 के दशक की मार्गदर्शिकाओं में इसका इतिहास दर्ज है: यहाँ कभी भैरव का मंदिर था, जो औरंगज़ेब के समय गिरा दिया गया और उस स्थान पर मस्जिद बनी, और 1809 में हिंदू-मुस्लिम दंगे में स्तंभ को भी गिराकर तोड़ दिया गया, जिसके बाद टुकड़ों को इकट्ठा करके आवरण में बंद किया गया। ई. बी. हैवेल इस स्तंभ को अशोक के किसी स्तंभ का खंड मानते थे; इस पृष्ठ के लिए पढ़े गए स्रोतों से यह बात तय नहीं होती। चबूतरे पर आज भी स्तंभ और नमाज़ की जगह दोनों हैं, और पर्वों पर यहाँ कड़ी सुरक्षा रहती है।
लाट भैरव का अपना एक उत्सव है: भाद्रपद पूर्णिमा को माता भैरवी के साथ बाबा लाट भैरव का विवाह। बाबा के रजत मुखौटे को मौर पहनाकर दूल्हे के रूप में सजाया जाता है और रथ पर बरात निकलती है। अमर उजाला के अनुसार सितंबर 2026 में बरात विश्वेश्वरगंज की इन्ना माई की गली से निकली, विश्वेश्वरगंज चौराहा होते हुए काल भैरव मंदिर पहुँची, जहाँ आरती उतारी गई, और फिर उत्तर की गलियों से होती हुई कपाल मोचन कुंड गई। तीन किलोमीटर का यह मार्ग तय करने में लगभग दस घंटे लगे। कुंड पर विवाह की रस्में हुईं, मुखौटे को भैरवी कूप की पाँच परिक्रमा कराई गई और फिर विग्रह पर धारण कराया गया।
तीर्थयात्री के लिए ये दोनों स्थान एक-दूसरे से जुड़े हैं। कपाल मोचन वह जगह है जहाँ भटकना समाप्त हुआ और दोष छूटा, और भैरोनाथ का मंदिर वह जगह है जहाँ कोतवाल ने अपना पद सँभाला। लाट भैरव काल भैरव मंदिर से लगभग दो किलोमीटर उत्तर-पूर्व में, रेलवे क्रॉसिंग के पास है, और वहाँ प्रायः ऑटो या ई-रिक्शा से जाया जाता है। कपाल ठीक कहाँ गिरा, इस पर सब विवरण हर बात में एकमत नहीं हैं। काल भैरव मंदिर के महंत इसे इस तरह सुनाते हैं: जहाँ कपाल गिरा वहाँ भैरव पहले कपाल भैरव के रूप में स्थापित हुए, उन्होंने एक कुंड बनाकर स्नान किया, और फिर शिव के कहने पर उस टीले पर आए जहाँ आज का मंदिर है।

समाचारों में मंदिर, 2021 से 2026
कोतवाल की अनुमति लेने की परंपरा सबसे ऊँचे स्तर तक निभाई जाती है। 13 दिसंबर 2021 को प्रधानमंत्री ने काशी विश्वनाथ कॉरिडोर के लोकार्पण से पहले काल भैरव मंदिर में पूजा की, और 14 मई 2024 को वाराणसी से नामांकन भरने से पहले वे फिर यहाँ आए। 2022 और 2024 की समाचार रिपोर्टों में महंत के हवाले से कहा गया है कि जिलाधिकारी, पुलिस कमिश्नर और अन्य अधिकारी कार्यभार सँभालने से पहले दर्शन करने आते हैं।
2024 के अंत में मंदिर के अपने नियम बदले। गर्भगृह में केक काटे जाने के एक वीडियो की आलोचना के बाद महंत परिवार और प्रबंधन ने 1 दिसंबर 2024 को घोषणा की कि अब मंदिर में केक नहीं काटा जाएगा और गर्भगृह में फोटो, वीडियो और रील बनाने की अनुमति नहीं होगी। परिवार के सदस्यों ने आज तक को बताया कि आगे चलकर फोटोग्राफी पर रोक पूरे परिसर में लागू की जाएगी और गर्भगृह में जाने वालों पर विशेष नज़र रखी जाएगी। काशी विद्वत परिषद ने इस निर्णय का स्वागत किया।
भीड़ और दलाल दूसरी बार-बार आने वाली ख़बर रहे हैं। अमर उजाला ने दिसंबर 2025 में बताया कि सामान्य दिनों में साठ से सत्तर हज़ार लोग आते हैं और एक रविवार को लगभग तीन लाख पहुँचे, जब मैदागिन से विश्वेश्वरगंज तक कतारें लगीं और कोतवाली पुलिस ने बैरिकेडिंग की। उसी महीने पुलिस ने दस दलालों को गिरफ़्तार किया, जो सीधे दर्शन के नाम पर श्रद्धालुओं से 500 से 1,100 रुपये तक ले रहे थे। मई 2026 में डेक्कन क्रॉनिकल ने लिखा कि मंदिर क्षेत्र से ग्यारह और कथित दलाल हिरासत में लिए गए और मंदिर के पुजारियों के समर्थन से पूरे परिसर में सीसीटीवी कैमरे लगाए जा रहे हैं, जिनकी निगरानी में प्रवेश-द्वार भी रहेंगे।
गलियाँ भी बदलने वाली हैं। सितंबर 2026 में भारत पेट्रोलियम ने वाराणसी विकास प्राधिकरण के साथ 21.21 करोड़ रुपये का समझौता किया, जिसके अंतर्गत पुराने नगर के विरासत मार्गों का जीर्णोद्धार होगा; इनमें ठठेरी बाज़ार की विरासत गली से काल भैरव मंदिर तक का मार्ग भी शामिल है। इस काम में पत्थर का फ़र्श, भवनों के अग्रभाग की मरम्मत, विरासत शैली की रोशनी, संकेतक और बैठने की व्यवस्था शामिल है, और इसे 36 महीनों में पूरा किया जाना है। आने वाले वर्षों में दर्शनार्थियों को रास्ते के कुछ हिस्सों पर काम चलता मिल सकता है।
एक नज़र में
- आराध्य
- काल भैरव, शिव का रौद्र रूप
- मान्यता
- काशी के कोतवाल (रक्षक और दंडाधिकारी)
- विग्रह
- रजत मुख वाला विग्रह; वाहन श्वान (कुत्ता)
- प्रसिद्धि
- रक्षा का काला धागा और मोरपंख के दंड का आशीर्वाद
- शास्त्रीय उल्लेख
- स्कंद पुराण का काशी खंड
- वर्तमान भवन
- मराठा कालीन; शिलालेख के अनुसार 1817 (बाजीराव द्वितीय) बताया जाता है। अन्य स्रोतों में मतभेद है
- स्थान
- भैरोनाथ, विश्वेश्वरगंज, काशी विश्वनाथ से लगभग 1.5 किमी उत्तर
- प्रमुख पर्व
- भैरव अष्टमी (काल भैरव जयंती)